ग़ज़लों में हमेशा ही दुनिया से जुड़ी उन बातों का ज़िक्र होता है, जो दिल को छू जाती हैं. इस ग़ज़ल के हर मिसरे में भी आपको आज के दौर की ज़िंदगी के इर्द-गिर्द मौजूद कई सच्चाईयां मिलेंगी.
इस दर्दनाक दौर की तुमको ख़बर नहीं है
किसी के दर्द का तुम पर असर नहीं है
यह वक्त है आज का कल गुज़र जाएगा
बड़ी ही लंबी है ज़िंदगी मुख़्तसर नहीं है
तिनका तिनका जोड़ आशियाना बसाता है
परिंदा जानता है ये उसका शजर नहीं है
कब तक जियोगे जो इतना जमा रहे हो
यहां हमेशा रहने वाली कोई बशर नहीं है
तुम कब तक छुप कर वार करते रहोगे
सामना करने का तुम में जिगर नहीं है?
कुछ तो लिहाज़ कर लेते रिश्तों का
या तुम्हें रिश्तों की ही क़दर नहीं है
सिर्फ़ दूसरों के घर पर है तुम्हारी नज़र
या फिर तुम्हारी अपनी ही नज़र नहीं है
क्या तुम सिर्फ़ अपना ही घर चलाओगे?
क्या दूसरों का घर तुम्हारे लिए घर नहीं है?
ज़मीन पर कब तक फिरोगे ग़ुरूर में
शायद तुम्हें ख़ुदा का भी डर नहीं है
ताकत का ज़ोर कब तक दिखाओगे
कभी घुटने टेकने वाला ये शहर नहीं है