अक्षय तृतीया और ईद का एक ही दिन आना, उन लोगों के मन में सुनहरी यादों के जी उठने जैसा है, जो अपने बचपन में धार्मिक सद्भावना के साक्षी रहे हैं. कहानीकार-कवयित्री डॉ संगीता झा ‘सना और सीता’ नामक दो सहेलियों के माध्यम से कुरान और गीता को एक प्लैटफ़ॉर्म पर खड़ा कर देती हैं और पूछती हैं ‘क्या वो दिन फिर आएंगे?’ कविता के नीचे डॉ संगीता झा का काव्यपाठ है.
याद बहुत आते हैं
वो बचपन वाले दिन
बचपन के वो
गुड्डे गुड़ियों वाले दिन
ईद पर ढेर सारी सेवईयां
खाने वाले दिन
सेवईयों के संग
ईदी भी पाने वाले दिन
वो सना और मैं सीता
एक था उसका क़ुरान
और एक थी मेरी गीता
मेरा माथा उसकी पेशानी
नहीं हमें थी कोई परेशानी
उसका गुड्डा मेरी गुड़िया
नहीं उससे कोई जोड़ी बढ़िया
आज फिर ईद मन रही है उसके घर
आज सजा है एक मंडप मेरी डगर
उसका घर मेरी डगर के पास है
दिल में अभी भी उसकी आस है
ना उसने कुछ किया
ना मैंने कुछ किया
फिर सेवईयों का स्वाद
मेरा क्यों घुल गया?
सचमुच याद बहुत आते हैं
बचपन की अक्षय तृतीया के वो दिन
इंतज़ार करते थे जिसका सना और मैं
रोज़ तारे गिन गिन
क्या आज भी उसके गुड्डे के
सपनों में होगी मेरी गुड़िया?
क्या सना भी याद करती होगी
मेरे घर के प्रसाद की पुड़िया?
याद आते हैं बार-बार वो आंखों में
ना अटकने वाले प्यारे-प्यारे दिन
मेरी ईदी उसकी दिवाली
किसी को ना खटकने वाले दिन
आज अक्षय तृतीया और ईद
साथ आए हैं बरसों बाद
आंखों में भर आया है पानी
दिल को सता रही सना की याद
क्यों ना आज फिर दिल को
दी जाए दस्तक
दौड़ कर चूम लूं
मैं सना का मस्तक
एक साथ हम मनाएं
अक्षय तृतीया और ईद
बच्चों के दिल में जगाएं
फिर वही उम्मीद
एक हैं हम सब
एक है हमारा वतन
नहीं बांट सकोगे हमें
कितने भी कर लो जतन
यादों को हक़ीक़त
में बदल डालें
दिमाग़ से दूर कर दें
सारे जाले
संग संग गाएं
बचपन के वो दिन फिर से बुलाएं
मीठी यादों को हक़ीक़त
में बदलने वाले दिन
याद बहुत आते हैं
वो बचपन वाले दिन
Illustration: Pinterest
डॉ संगीता झा द्वारा काव्यपाठ
