घर के बाहर निकल कर आप अपने अंदर झांक सकते हैं. कवि-लेखक मुक्तिबोध ने रेल्वे प्लैटफ़ॉर्म पर गुज़ारी एक रात का वर्णन करते हुए इंसान और इंसानियत के कई पहलुओं से रूबरू कराया है. वे न केवल ख़ुद के अंदर झांकते हैं, बल्कि पाठकों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करते हैं.
रेलवे स्टेशन, लंबा और सूना! कड़ाके की सर्दी! मैं ओवरकोट पहने हुए इत्मीनान से सिगरेट पीता हुआ घूम रहा हूं.
मुझे इस स्टेशन पर अभी पांच घंटे रुकना है. गाड़ी रात के साढ़े बारह बजे आएगी.
रुकना, रुकना, रुकना! रुकते-रुकते चलना! अजीब मनहूसियत है!
प्लैटफ़ॉर्म के पास से गुज़रनेवाली लोहे की पटरियां सूनी हैं. शंटिंग भी नहीं है. पटरियों के उस पार, थोड़ी ही दूरी पर रेलवे का अहाता है, अहाता के उस पार सड़क है! शाम को छह बजे ही सड़क पर और उससे लगे हुए नए मकानों में बिजलियां झिलमिलाने लगी हैं!
उदास और मटमैली शाम! एक बार टी-स्टॉल पर चाय पी आया हूं. फिर कहां जाऊं! शहर में जा कर भोजन कर आऊं? लेकिन यहां सामान कौन देखेगा. आस-पास बैठे हुए मुसाफ़िर फटी चादरों और धोतियों को ओढ़े हुए, सिमटे-सिमटे, ठिठुरे-ठिठुरे चुपचाप बैठे हैं. इनके भरोसे सामान कैसे लगाया जाए! कोई भी उसमें से कुछ उठा कर चंपत हो सकता है.
टी-स्टॉल की तरफ़ नज़र डालता हूं. इक्के-दुक्के मुसाफ़िर घुटने छाती से चिपकाए बैठे हुए दिखाई दे रहे हैं. गरम ओवरकोट पहन कर चलनेवाला सिर्फ़ मैं हूं, मैं.
अगर कोई भी मुझे उस वक्त देखता तो पाता कि मैं कितने इत्मीनान और आत्म-विश्वास के साथ क़दम बढ़ा रहा हूं. इतनी शान मुझे पहले कभी महसूस नहीं हुई थी. यह बात अलग है कि गरम ओवरकोट उधार लिया हुआ है. राजनांदगांव से जबलपुर जाते समय एक मित्र ने कृपापूर्वक उसे प्रदान किया था. इसमें संदेह नहीं कि समाज में अगर अच्छे आदमी न रहें, तो वह एक क्षण न चले.
सिगरेट पीते हुए मैं मुसाफ़िरखाने की तरफ़ देखता हूं. वहां आदमी नहीं, आदमीनुमा गंदा सामान इधर-उधर बिखेर दिया गया है. उनकी तुलना में सचमुच मैं कितना शानदार हूं.
अनजाने ही मैं अकड़ कर चलने लगता हूं; और किसी को ताव बताने की, किसी पर रौब झाड़ने की तबीयत होती हैं इन सब टूटे हुए अक्षर (प्रेस टाइप)-जैसे लोगों के बीच गुज़र कर अपने को काफ़ी ऊंचा और प्रभावशाली समझने लगता हूं. सच कहता हूं, इस समय मेरे पास पैसे भी हैं. अगर कोई भिखारी इस समय आता तो मैं अवश्य ही उसे कुछ प्रदान करता. लेकिन भिखारी बेवकूफ थोड़े ही था, जो वहां आए; वहां तो सभी लगभग भिखारी थे.
सोचा कि ट्रंक खोल कर सामान निकाल कर कुछ जरूरी चिट्ठियां लिख डालूं. मैंने एक सम्माननीय नेता को इसी प्रकार समय सदुपयोग करते हुए देखा था. अभी उजाला काफ़ी था. दो-चार चिट्ठियां रगड़ी जा सकती थीं. ट्रंक के पास मैं गया भी. उसे खोल भी दिया. लेकिन कलम उठाने के बजाय, मैंने पीतल का एक डिब्बा उठा लिया. ढक्कन खोल कर मैंने उसमें से एक ‘गाकर लड्डू’ निकाला और मुंह में भर लिया. बहुत स्वादिष्ट था वह. उसमें गुड़ और डालडा घी मिला हुआ था. इसी बीच मुझे घर के बच्चों की याद आई. और मैंने दूसरा लड्डू मुंह में डालने की प्रवृत्ति पर पाबंदी लगा दी.
तभी मुझे गांधीजी की याद आई. क्या सिखाया उन्होंने? पर दु:ख कातरता. इंद्रिय-संयम. यह मैं क्या कर रहा हूं. यद्यपि लड्डू मेरे ही लिए दिए गए हैं और मैं पूर्णतया उन्हें खाने का नैतिक अधिकार भी रखता हूं. लेकिन क्या यह सच नहीं है कि बच्चों को सिर्फ़ आधा-आधा ही दिया गया है. फिर मैं तो एक खा चुका हूं.
पानी पीने के लिए निकालता हूं. मुसाफ़िर वैसे ही ठिठुरे-ठिठुरे, सिमटे-सिमटे बैठे हैं. उनके पास गरम कोट तो क्या, साधारण कपड़े भी नहीं हैं. उनमें से कुछ बीड़ी पी रहे हैं. किसी के पास गरम कोट नहीं है, सिवा मेरे. मैं अकड़ता हुआ स्टॉल पर पानी की तलाश में जाता हूं.
मैं पूर्ण आत्म-संतोष का आनंद-लाभ करता हुआ वापस लौटता हूं कि अब इस कार्यक्रम के बाद कौन-सा महान कार्य करूं.
दूर से देखता हूं कि सामान सुरक्षित है. शाम डूब रही है. अंधेरा छा गया है. अभी कम से कम चार घंटे यहीं पड़े रहना है. एक पोर्टर से बात करते हुए कुछ समय और गुज़ार देता हूं.
और फिर होल्डाल निकाल कर बिस्तर बिछा देता हूं. सुंदर, गुलाबी अलवान और ख़ुशनुमा कंबल निकल पड़ता है. मैं अपने को वाक़ई भला आदमी समझने लगता हूं. यद्यपि यह सच है कि दोनों चीज़ों में से एक भी मेरी अपनी नहीं है.
ओवरकोट समेत मैं बिस्तर पर ढेर हो जाता हूं. टूटी हुई चप्पलें बिस्तर के नीचे सिर के पास इस तरह जमा कर देता हूं कि मानो वह धन हो. धन तो वह हई है. कोई उसे मार ले तो! तब पता चलेगा!
गुलाबी अलवान ओढ़ कर पड़ रहता हूं. अभी तक स्टेशन पर कपड़ों के मामले में मुझे चुनौती देनेवाला कोई नहीं आया (शायद यह इलाक़ा बहुत ग़रीब हैं). कहीं भी, एक भी ख़ुशहाल, सुंदर, परिपुष्ट आकृति नहीं दिखाई दी.
कैसा मनहूस प्लैटफ़ॉर्म है?
मेरे बिस्तर के पास एक सीमेंट की बेंच है. वहां गठरियां रखी हुई हैं. सोचता हूं, उस पर अपना ट्रंक क्यों न रख दूं. गठरियां नीचे भी डल सकती हैं. ट्रंक उनसे उम्दा चीज है; उसे साफ-सुथरी बेंच पर होना चाहिए.
लेकिन उठने की हिम्मत नहीं होती. कड़ाके का जाड़ा है. अलवान के बाहर मुंह निकालने की तबीयत नहीं हो रही हैं. लेकिन नींद भी तो आंखों से दूर है.
विचित्र समस्या है. ख़ुद ही अकेले में, अपने को अकेले ही शानदार समझते रहो. इसमें क्या धरा है. शान का संबंध अपने से ज़्यादा दूसरों से है. यह अब मालूम हुआ. लेकिन किस मुश्क़िल में.
उसी बीच एकाएक न मालूम कहां से चार फ़ीट का एक गोरा चिट्ठा लड़का सामने आ जाता है. वह टेरोलिन का कुरता पहने हुए है. खाकी चड्ढी है. चेहरा लगभग गोल है. गोरे चेहरे पर भौंओं की धुंधली लकीर दिखाई देती है. या उनका रंग भी गोरा है.
वह सामने खड़े-ही-खड़े एक चमड़े के छोटे-से बैग की ओर इशारा करते हुए कहता है, ‘सा’ब, ज़रा ध्यान रखिएगा. मैं अभी आया.’ एकाएक इस तरह किसी का आ कर कुछ कहना मुझे अच्छा लगा! उसकी आवाज़ कमज़ोर है. लेकिन उस आवाज़ में भले घर की झलक है. उसके साफ़-सुथरे कपड़ों से भी यही बात झलकती है.
मैं ‘हां’ कह ही रहा था कि उसके पहले लड़का चला गया. मैं उसके बारे में सोचता रहा, न जाने क्या.
आधे घंटे बाद वह फिर आया. और चुपचाप चमड़े के बैग के पास जा कर बैठ गया. सर्दी के मारे उसने अपनी हथेलियां खाकी चड्ढी की जेब में डाल रखी थीं. मैंने गुलाबी अलवान के नीचे से मुंह उठा कर उसे देखा.
भले ही वह टेरीलीन का बुश्शर्ट पहने हो, वह ख़ूब ठिठुर रहा था. बुश्शर्ट के नीचे एक अंडरवीयर था. बस! उसके पास ओढ़ने-बिछाने के भी कपड़े नहीं थे.
कुछ कुतूहल और कुछ चिंता से मैंने पूछा, ‘तुम ओढ़ने के कपड़े ले कर क्यों नहीं आए. कितना जाड़ा है. ऐसे कैसे निकल आए.’
उसने जो उत्तर दिया उसका आशय यह था कि यहां से क़रीब पचास मील दूर शहर बालाघाट में एक बारात उतरी थी. उसमें वह, उसके घरवाले और दूसरे रिश्तेदार भी थे. एक रिश्तेदार वहां से आज ही नागपुर चल दिया, लेकिन अपना चमड़े का बैग भूल गया. चूंकि वहांवालों को मालूम था कि गाड़ी नागपुरवाली उस स्टेशन से बहुत देर से छूटती है, इसलिए उन्होंने इस लड़के के साथ यह बैग भेज दिया.
लेकिन अब यह लड़का कह रहा है कि रिश्तेदार कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं. वह दो बार प्लैटफ़ॉर्म के चक्कर काट आया है. शायद वे संबंधी महोदय बस से नागपुर रवाना हो गए. और अब चमड़े का बैग संभाले हुए यह लड़का सर्दी में ठिठुरता हुआ यहां बैठा है. वह भी मेरी साढ़े बारह बजेवाली गाड़ी से बालाघाट पहुंच जाएगा. यह गाड़ी वहां रात के डेढ़ बजे पहुंचती है.
कड़ाके का जाड़ा और रात के डेढ़. मैंने कल्पना की कि इसकी मां फूहड़ है, या वह उसकी सौतेली मां है. आख़िर उसने क्या सोच कर अपने लड़के को इस भयानक सर्दी में, बिना किसी ख़ास इंतज़ाम के एक ज़िम्मेदारी दे कर रवाना कर दिया.
मैंने फिर लड़के की तरफ़ देखा. वह मारे सर्दी के बुरी तरह ठिठुर रहा था. और मैं अपने अलवान और कंबल का गरम सुख प्राप्त करते हुए आनंद अनुभव कर रहा था.
मैं बिस्तर से उठ पड़ा. ट्रंक खोला. उसमें से डबलरोटी के दो टुकड़े निकाले. फिर सोचा, एक लड्डू भी निकाल लूं. किंतु यह विचार आया की लड़का टेरीलीन का बुश्शर्ट पहने है. फिर लड्डू गुड़ के हैं. वह उसका अनादर कर सकता है.
उसके हाथ में डबलरोटी के दो टुकड़े और चायवाले से लिया हुआ एक चाय का कप देते हुए कहा, ‘तुमने अभी तक कुछ नहीं खाया है. लो, इसे लो.’
‘नहीं-नहीं, मैंने अभी भजिये खाए हैं.’ और लड़के के नन्हे हाथों ने तुरंत ही लपक कर उसे ले लिया. उसको खाते-पीते देख कर मेरी आत्मा तृप्त हो रही थी.
मैंने पूछा,’बालाघाट से कब चले थे?’
‘तीन बजे.’
‘तीन बजे से तुमने कुछ नहीं खाया?’
‘नहीं तो, दो आने के भजिये खाए थे. चाय पी थी.’
मेरा ध्यान फिर उसके माता-पिता की ओर गया और मैं मन-ही-मन उन्हें गाली देने लगा.
मुझे नींद नहीं आ रही थी. मैंने लड़के से कहा, ‘आओ, बिस्तर पर चले आओ. साढ़े दस बजे उठा दूंगा.’
लड़के ने तुरंत ही चमड़े के अपने कीमती जूते के बंद खोले, मोजे निकाले. सिरहाने रख दिया. और बिस्तर के भीतर पड़ गया.
मैं ट्रंक के पास बैठा हुआ था. लड़का मेरे बिस्तरे पर. मैं खुद जाड़े में. वह गरमी महसूस करता हुआ.
किंतु मेरा ध्यान उस लड़के की तरफ़ था. कितना भोला विश्वास है उसके चेहरे पर.
और मैं सोचने लगा कि मनुष्यता इसी भोले विश्वास पर चलती है. और इस भोले विश्वास के वातावरण में ही कपट और छल करने वाले पनपने हैं.
मेरे बदन पर ओवरकोट था, लेकिन अब वह कोई गरमी नहीं दे रहा था.
मैं फिर से टी-स्टॉल पर गया. फिर एक कप चाय पी और मनुष्य के भाग्य के बारे में सोचने लगा. मान लीजिए, इस लड़के के पिता ने दूसरी शादी कर ली है. इस लड़के की मां मर गई है, और जो है, वह सौतेली है. अगर अभी से वह लड़के की इतनी उपेक्षा करती है तो हो चुकी अच्छी तालीम. क्या पता, इस लड़के का भाग्य क्या हो!
लड़के ने मेरी दी हुई हर चीज़ लपक कर ली थी. मुझ पर ख़ूब गहरा विश्वास कर लिया था. क्या यह इसका सबूत नहीं है कि लड़के के दिल में कहीं कोई जगह है जो कुछ मांगती है, कुछ चाहती है. ईश्वर करे, उसका भविष्य अच्छा बने.
इन्ही खयालों में डूबता-उतराता मैं अपने बच्चों को देखने लगा जो घर में दरवाज़े बंद करके भी तेज़ सर्दी महसूस कर रहे होंगे. उनके पास रजाई भी नहीं है. तरह-तरह के कपड़े जोड़-जाड़ कर जाड़ा निकालते हैं. इस समय, घर सूना होगा और वे मेरी याद करते बैठे होंगे. बच्चे! बच्चे और उनकी वह मां, जो सिर्फ़ भात खा कर मोटी हुई जा रही है, लेकिन चेहरा पर पीलापन है.
मैंने बच्चों को सिखा दिया है कि बेटे कभी इच्छामय दृष्टि से दुनिया को मत देखना. वह मामूली इच्छा भी पूरी नहीं कर सकती. और चाहे जो करो, मौक़ा पड़ने पर झूठ बोल सकते हो, लेकिन यह मत भूलना कि तुम्हारे ग़रीब मां-बाप थे. तुम्हारी जन्मभूमि ज़मीन और धूर और पत्थर से बनी यह भारत की धरती ही नहीं है. वह है-ग़रीबी. तुम कटे-पिटे दागदार चेहरेवालों की संतान हो. उनसे द्रोह मत करो. अपने इन लोगों को मत त्यागना. प्रगतिवाद तो मैंने अपने घर से ही शुरू कर दिया था. मेरे बड़े बच्चे को यह कविता रटा दी थी –
ज़िंदगी की कोख में जन्मा
नया इस्पात
दिल के ख़ून में रंग कर!
तुम्हारे शब्द मेरे शब्द
मानव-देह धारण कर
अरे चक्कर लगा घर-घर, सभी से कह रहे हैं
… सामना करना मुसीबत का,
बहुत तन कर
ख़ुद को हाथ में रख कर.
उपेक्षित काल-पीड़ित सत्य-गो के यूथ
उदासी से भरे गंभीर
मटमैले गऊ चेहरे.
उन्हीं को देख कर जीना
कि करुणा करनी की मां है.
बाक़ी सब कुहासा है, धुआं-सा है.
लेकिन, यह थोड़े ही है कि लड़का मेरी बात मान ही जाएगा. मनुष्य में कैसे परिवर्तन होते हैं. संभव है, वह थानेदार बन जाए और डंडे चलाए. कौन जानता है.
मैं अपनी ही कविता का मज़ा लेता हुआ और भीतर झूमता हुआ वापस लौटता हूं. उस वक़्त सर्दी मुझे कम महसूस होने लगती है. बिस्तर के पास जा कर खड़ा हो जाता हूं. और गुलाबी अलवान और नरम कंबल के नीचे सोए हुए उस बालक की शांति निद्रित मुद्रा को मग्न अवस्था में देखने लगता हूं. और मेरे हृदय में प्रसन्न ज्योति जलने लगती है.
कि इसी बीच मुझे बैठ जाने की तबीयत होती है. पासवाली सीमेंट की बेंच पर ज़रा टिक जाता हूं. और बाईं ओर रेलवे अहाते के पार देखने लगता हूं.
बाईं ओर बेंच पर रखी गठरियों के पास बैठे हुए एक-दूसरी आकृति की ओर ध्यान जाता है.
हरी धारीवाला एक सफ़ेद शर्ट पहने वह बालक है, जो घुटनों को छाती से चिपकाए बैठा है. बांहों से उसने अपने घुटनों को छाती से जकड़ लिया है, और ऊपरवाली बीच की पोली जगह में उसने अपना मुंह फंसा लिया है. मुझे उसका मुंह नहीं दीखता, सिर्फ़ उसका सिर और बाल दिखते हैं. वह न मालूम कब से वैसा बैठा है. और ठिठुरा-ठिठुरा (गठरियों के बीच) वह ख़ुद गठरी बन कर लुप्त-सा हो गया है.
अगर मैं अपने लड़के को आज रात को सफ़र कराता तो शायद वह भी इसी तरह बैठता. क्यों बैठता! मैं तो उसका इंतजाम करके भेजता, किसी भी तरह, क्योंकि मेरे कनेक्शंस (संबंध) अच्छे हैं. इस बेचारे ग़रीब देहाती के लड़के के संबंध क्या हो सकते हैं.
मैं उस लड़के को पुन: एकाग्रचित से देखने लगता हूं. उसका मुंह अभी तक घुटनों के बीच फंसा है. अपने अस्तित्व का नगण्य और शून्य बना कर वह किसी नि:संग अंधकार में विलीन होना चाह रहा है.
मैं उसके पास जा कर खड़ा हो जाता हूं, ताकि उसकी हलचल, अगर है, तो दिखाई दे. लेकिन नहीं, उसने तो अपने और मेरे बीच एक फासला मुख्य कर लिया है. लेकिन क्या यह सच नहीं है कि मैं उसे उठा सकता हूं, मैं उसे कुछ-न-कुछ दे सकता हूं. मैं उसे भी डबलरोटी का एक टुकड़ा और एक कप चाय दे कर उसके भीतर गरमी पैदा कर सकता हूं.
मैं उसके पास खड़ा हूं. और एक क्षण में नवीन कार्य-श्रृंखला गतिमान कर सकता हूं. काम तो यांत्रिक रूप से चलते हैं. एक के बाद एक.
लेकिन मैं वहां से हट जाता हूं. फिर बेंच के किनारे पर बैठ जाता हूं और फिर प्लैटफ़ॉर्म की सूनी बत्तियों को देखने लगता हूं. मेरा मन एकाएक स्तब्ध हो जाता है.
मेरे बिस्तर पर सोनेवाला बालक ठीक समय पर अपने-आप ही जाग उठा. तुरंत मोजे पहने, चमड़े का कीमती जूता पहना, बंद बांधे. अपने टेरीलीन के बुश्शर्ट को ठीक किया. नेकर की जेब में से कंघी निकाल कर बालों को संवारा.
और बिस्तर से बाहर आ कर खड़ा हो गया, चुस्त और मुस्तैद. और फिर अपनी उसी कमज़ोर पतली आवाज़ में कहा, ‘टिकिट-घर खुल गया होगा.’
मैंने पूछा, ‘टिकिट के लिए पैसे हैं, या दूं?’
‘नहीं, नहीं, वह सब मेरे पास हैं.’ यह उसने इस तरह कहा जैसे वह अपनी देखभाल अच्छी तरह कर सकता हो.
वह चला गया. मुझे लगा कि टेरीलीन के बुश्शर्टवाले इस बालक को दूसरों की सहायता का अच्छा अनुभव है. और वह स्वयं एक सीमा तक छल और निश्छलता का विवेक कर सकता है.
मेरा बिस्तर ख़ाली हो गया और अब मैं चाहूं तो बेंच के दूसरे छोर पर घुटनों में मुंह ढांपे इस दूसरे बालक को आराम की सुविधा दे सकता हूं.
और मैं अपने मन मे नि:संग अंधकार में कहता जाता हूं, ‘उठो, उठो, उस बालक को बिस्तर दो.’
लेकिन मैं जड़ हो गया हूं. और मेरे अंधेरे के भीतर एक नाराज़ और सख्त आवाज़ सुनाई देती है, ‘मेरा बिस्तर क्या इसलिए है कि वह सार्वजनिक संपत्ति बने. ऐसे न मालूम कितने ही बालक हैं जो सड़कों पर घूमते रहते हैं.’
मैं बेंच के किनारे पर से उठ पड़ता हूं और टी-स्टॉल पर जा कर एक कप चाय पीता हूं. सर्दी मेरे बदन में कुछ कम होती है. और फिर मैं अपने सामान की तरफ़ रवाना होता हूं.
सीमेंट की ठंडी बेंच के किनारे पर घुटनों में मुंह ढांपे हुए उस बालक की आकृति मुझे दूर ही से दिखाई देती है. क्या वह सर्दी में ठिठुर कर मर तो नहीं गया.
लेकिन पास पहुंच कर भी मैं उसे हिलाता-डुलाता नहीं, उसे जगाने की कोशिश नहीं करता, न उसके चारों ओर, चुपचाप, अलवान डालने की कोशिश करता. सोचता हूं करना चाहिए; लेकिन नहीं करता.
आश्चर्य है कि मैं भीतर से इतना जड़ हो गया हूं, कौन-सी वह भीतरी पकड़ है जो मुझे वैसा करने से रोकती है.
मैं टिकिट ख़रीदने गए टेरीलीनवाले लड़के की राह देखता हूं. वह अब तक क्यों नहीं आया?
कि एकाएक यह ख़्याल पूरे जोर के साथ कौंध उठता है-अगर मैं ठंड से सिकुड़ते इस लड़के को बिस्तर दूं तो मेरी (दूसरों की ली हुई ही क्यों न सही) यह कीमती अलवान और यह नरम कंबल, और यह दूधिया चादर ख़राब हो जाएगी. मैली हो जाएगी. क्योंकि जैसा कि साफ़ दिखाई देता है यह लड़का अच्छे ख़ासे साफ़-सुथरे बढ़िया कपड़े पहने हुए थोड़े है. मुद्दा यह है. हां मुद्दा यह है कि वह दूसरे ओर निचले किस्म के, निचले तबके के लोगों की पैदावार है.
मैं अपने भीतर ही नंगा हो जाता हूं. और अपने नंगेपन को ढांपने की कोशिश भी नहीं करता.
उस वक़्त घड़ी ठीक बारह बजा रही थी और गाड़ी आने में अभी आधा घंटा की देर थी.
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