कुछ शब्द डिक्शनरी से ग़ायब हो रहे हैं: अमरेन्द्र यादव की कविता
हर बीतते दिन के साथ, बहुत कुछ पीछे छूट जाता है. कैलेंडर के पन्नों के बदलते ही काफ़ी कुछ बदल ...
हर बीतते दिन के साथ, बहुत कुछ पीछे छूट जाता है. कैलेंडर के पन्नों के बदलते ही काफ़ी कुछ बदल ...
कवियों-लेखकों ने मां को परिभाषित करने का हर युग में प्रयास किया है. सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म इंस्टाग्राम पर हिंदी लिखनेवालों ...
मां कहने को तो एक शब्द है, पर जब इसे परिभाषित करने जाएं तो दुनिया के सारे शब्द कम पड़ ...
यूं तो कहने के लिए कवि हूबनाथ पांडे की यह कविता है, पर इसका एक-एक शब्द देश की दशा बयां ...
आधे और पूरे की व्याख्या करनेवाली ऐसी बेमिसाल कविता आपने शायद ही कभी पढ़ी हो. कवि नरेश सक्सेना की यह ...
एक आम आदमी की ज़िंदगी कैसी होती है. मरहूम कवि कुंवर बेचैन की यह छोटी-सी कविता बख़ूबी बयां कर रही ...
कविताएं मुश्क़िल समय में संबल देने का काम करती रही हैं. आज के इस कठिन संक्रमण काल में कवि हूबनाथ ...
समकालीन उर्दू के जाने-माने शायर हैं शकील जमाली. उनकी नज़्म ‘उलटे सीधे सपने पाले बैठे हैं’ समाज के विरोधाभासों और ...
सड़क पर एक आदमी जा रहा है और कवि अशोक वाजपेयी दुनिया से बेख़बर उस आदमी का निरीक्षण कर रहे ...
गेहूं की जीवनयात्रा का इतना सटीक विश्लेषण आपने शायद ही कहीं पढ़ा हो. कविता गेहूं का अस्थि विसर्जन में युवा ...
हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.
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